Gonda Colonelganj News: बाढ की दुश्वारियों का आज तक नही बना कोई विकल्प,9 माह तक तैयार गृहस्थी को छोड़कर तीन माह एल्गिन-चरसडी बंंधे पर रहने को विवश ग्रामीण

एसपी सिंह / ज्ञान प्रकाश मिश्रा

करनैलगंंज ,गोण्डा । 12 वर्षों से लगातार प्रतिवर्ष तीन महीनों तक बाढ़ की दुश्वारियां झेल रहे ग्रामीणों के लिए सरकारी महकमा कोई विकल्प नहीं तलाश सका है। साल के 9 महीने अपने घर और खेत को संभालना और जून का महीना आते ही 3 महीने के लिए उस संवारे गए घर और खेत को छोड़कर बांध पर आशियाना बनाना, लोगों की जिंदगी में शामिल हो गया है।

गोंडा और बाराबंकी की सीमा पर बसे गांवों की स्थिति बेहद दयनीय है। जहां ग्राम परसावल, नैपूरा, कमियार, माझा रायपुर एवं बेहटा के ग्रामीणों का दोष सिर्फ इतना है कि बीच में घाघरा नदी ने उन्हें न इधर का छोड़ा है न उधर का छोड़ा है। खाने के लिए अनाज नही है। कहीं से अनाज या खाद्दान्न मिल गया तो चूल्हा जलने के लिए लकड़ी की दरकार है। घर का सारा सामान भीग चुका है रात के समय जलाने के लिए चिराग की रोशनी तक मयस्सर नही है। मांझा रायपुर के एल्गिन-चरसडी बांध पर बाढ़ से बचने के लिए आशियाना बना कर रहने को मजबूर महिलाएं गांव व घर में पानी भर जाने के बाद बांध पर एक छप्पर रखकर उसमें घर का सामान रखने के साथ ही उसी में चूल्हा, चौका करने व रहने के लिए विवश हैं।

महिलाओं में फूलपता, दुलारा, श्यामकली, मधू, जनकलली, प्यारा देवी, सुषमा, मंजू का कहना है कि घर मे रखा सारा अनाज भीग गया। डेहरी में रखा अनाज सड़ गया। निकालने का प्रयास किया तो सब मिट्टी में मिल गया। गेंहू जो बोरी में रखा था उसे किसी तरह निकाला गया तो सुखाया जा रहा है। जो आंटा था सब बेकार हो गया। चावल सड़ रहा है। दो दिनों तक घर में चूल्हा तक नही जला, बच्चों को बिस्कुट खिलाकर मजबूरन सुलाया गया। किसी तरह से लकड़ी की व्यवस्था करके बाजार से राशन मंगवाकर रोटी व नमक खाने को विवश हैं। बांध पर रहकर किसी तरह से परिवार समेत जीवन व्यतीत करना मजबूरी है।

 एल्गिन-चरसडी बांध पर हर साल एक नया आशियाना बनाना जिंदगी का हिस्सा बन गया है। गांव के ही संतराम, गंगाराम, जोधा, विश्वनाथ, तीरथ राम, शिवचरन, भुजई, राम रंग, सुमित, राम तीरथ का कहना है कि अपना घर और खेत छोड़कर कहां चले जाएं। गांव के बाहर बांध बना दिया गया है। नदी और बांध के बीच में उनकी जमीन और घर है। जहां हर साल बाढ़ आते ही पानी भर जाता है। तीन महीने तक उतार-चढ़ाव के बीच पूरे गांव में पानी भरा रहता है तब तक बांध पर छप्पर बना कर उसी में रहना, खाना और सोना होता है।

वहीं से अपने घर के रखवाली भी हो जाती है। नौ महीने के बीच जो भी राशन पानी कट्ठा होता है। उसे रखा जाता है और तीन महीने बैठकर खाना मजबूरी है। उसी नौ महीने में खेती, बारी, घर, द्वार, बच्चों की शादी और काम धंधे देखना पड़ता है। इसके अलावा तीन महीने की चिंता पूरे साल तक लोगों को सताती रहती है। बाढ़ आने पर नया आशियाना बनाने की चिंता भी लगी रहती है। ऐसे में उनके घरों में शादी विवाह और अन्य कोई कार्यक्रम भी सुचारू रूप से नहीं हो पाते हैं। ग्राम रायपुर, परसावल एवं कमियार के ग्रामीणों का कहना है कि जब बहुत बड़ी आपदा आती है तो बाराबंकी के अधिकारी एक बार हालचाल पूछने के लिए आ जाते हैं। न तो उन्हें कोई राशन मिलता है और न उन्हें बांध पर रहने के लिए कोई प्रकाश की व्यवस्था की जाती है। उन लोगों के घरों में पानी भर जाता है और उनकी जमीनें कटकर नदी में समाहित हो जाती हैं। जिसका कोई मुआवजा उन्हें नहीं मिलता है। ग्रामीणों का कहना है कि बस जितनी देर खाना बनाते और खाते हैं उतनी देर चिराग की रोशनी जलती है बाकी पूरी रात अंधेरों में काटना पड़ता है।

टॉर्च की रोशनी से घर और परिवार की रखवाली की जाती है। उन्हें रात के समय चिराग की रोशनी भी मयस्सर नहीं हो रही है। ग्रामीणों ने प्रशासन पर आरोप लगाया है कि उनके गांव जलमग्न हो गए हैं। कोई अधिकारी उनका हाल पूछने तक नहीं आया। ऐसी स्थिति में उनका जीवन समाज से बिल्कुल अलग हो गया है और उन्हें शासन-प्रशासन दुर्भावना की नजर से देख रहा है। उधर घाघरा के उतार-चढ़ाव में लगातार बाढ़ से प्रभावित गांवों में दुश्वारियां बढ़ती जा रही है। वहीं 4 दिन पूर्व खतरे के निशान से 2 फीट ऊपर बहने वाली सरयू नदी का जलस्तर शुक्रवार को एक फीट नीचे पहुंच गया। जो शनिवार से फिर एक बार से बढ़ना शुरू हो गया है। 

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