Lakhimpur- Kheri-News-छोटीकाशी में बाबा भूतनाथ के दर्शन बिना अधूरे माने जाते हैं शिव जी के दर्शन।

एन.के.मिश्रा

गोला गोकर्णनाथ, लखीमपुरखीरी। सप्तऋषियों में प्रसिद्ध पुलत्स्य का पुत्र विश्रवा जिसके तीन रानियां थीं। जिसमें पहली रानी से कुबेर दूसरी रानी से रावण और तीसरी रानी से विभीषण की उत्पत्ति हुई।

इन सब में रावण अत्यधिक बलवान, पराक्रमी एवं विद्वान था। उसने कैलाश पर्वत पर जाकर शिव जी की तपस्या की, किन्तु तपस्या का कोई फल उसे नहीं मिला। तब रावण ने हिमालय पर्वत पर जाकर एक गड्ढे में अग्नि प्रकट कर शिव जी का पार्थिव पूजन करने लगा। किन्तु काफी समय बीत जाने के बाद भी जब शिव जी प्रसन्न नही हुए तो रावण अपने मस्तक काट-काटकर अग्निकुंड में चढ़ाने लगा।

इस प्रकार उसने अपने नौ मस्तक अर्पण कर दिए और जब वह अपना दसवां मस्तक काटने ही जा रहा था कि उसी समय आशुतोष अवढरदानी भगवान शंकर प्रकट हो गए और रावण से मनोवांछित वर मांगने को कहा। तब रावण ने शिव जी से वचन लेकर लंका चलने का वर मांगा। इस पर शिव जी ने इस वर को छोड़कर दूसरा वर मांगने कहा किन्तु रावण ने शिव जी द्वारा दिए गए वचन को ध्यान दिलाते हुए अपने इसी वरदान को पूर्ण करने को कहा।  तब असमंजस में फंसे शिव जी ने कहा कि ठीक है परंतु मेरी भी एक शर्त है कि यदि तुम मुझे रास्ते में कहीं रख दोगे तो मैं वहीं पर स्थिर रहकर स्थापित हो जाऊंगा।

अहंकारी रावण ने शिव जी की इस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया। फिर रावण ने शिवलिंग को कांवर में रखकर वायुवेग से लंका की ओर चल पड़ा। तब शिव जी की लीला के चलते रावण को लघुशंका का तीव्र अहसास हुआ किन्तु अपनी प्रतिज्ञा एवं शिव जी की  शर्तानुसार वह व्याकुल हो उठा। इतने में ही वन में उसे गोकर्ण नाम का ग्वाला अपनी गायें चराते हुए दिखाई पड़ा। तब रावण ग्वाले के पास जाकर कांवर को उसे पकड़ाते हुए कहा कि मैं लघुशंका होकर शीघ्र आता हूँ, रावण के आग्रह करने पर ग्वाले ने कांवर को अपने कंधे पर रख लिया। तब शिव जी ने रावण का अहंकार तोड़ने के उद्देश्य से रावण की लघुशंका बढ़ा दी और इधर ग्वाले के कंधे पर रखी कांवर का वजन बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया।

जिससे कांवर इतनी भारी हो गई कि चरवाहा ग्वाला उसका वजन नहीं सह सका और कांवर को धरती पर रख दिया।जब रावण लघुशंका करके वापस आया और कांवर (शिव जी को) उठाने लगा, किन्तु शर्तानुसार जब वह शिव जी को उठा न सका तब दशानन क्रोधित होकर ग्वाले को मारने दौड़ा। रावण को अपनी ओर आता देखकर वह प्राण बचाकर  भागा। भागते-भागते जब वह रावण से किसी भी प्रकार अपने को बचता न देख उसे एक कुआँ दिखाई पड़ा और उसने उसी कुएं में छलांग लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। तब शिव जी की कृपा से उसी ग्वाला के नाम से यह क्षेत्र प्रसिद्ध हुआ।

यह कुआँ प्रसिद्ध शिव मंदिर से करीब एक किमी0 दूरी पर स्थित है और यह स्थान “भूतनाथ” के नाम से प्रसिद्ध है तथा नागपंचमी के बाद पड़ने वाले सोमवार को यहां “भूतनाथ” के नाम से बहुत विशाल मेला भी लगता है। हालांकि लॉक डाउन के चलते भूतनाथ मेला इस बार नही लग सकेगा। इस प्रकार शंकर जी के नाम के आगे उसी ग्वाला का नाम “गोकर्ण” लगने लगा। इस प्रकार इस क्षेत्र का नाम ग्वाला गोकर्णनाथ पड़ा। आज के समय में यह शिव नगरी गोला गोकर्णनाथ व छोटीकाशी के नाम से भी जानी जाती है।

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