Gonda News:जैव उर्वरकों के प्रयोग से बढ़ेगा फसलों का उत्पादन-डॉ०राम लखन सिंह

बी.के.ओझा

मनकापुर, गोण्डा ।आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या के द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र मनकापुर के वरिष्ठ शस्य वैज्ञानिक डॉ० राम लखन सिंह ने बताया कि फसलों का उत्पादन बढ़ाने में जैव उर्वरकों का प्रयोग बहुत जरूरी है ।रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति कमजोर हो चुकी है ।अत: किसान भाई जैव उर्वरकों का प्रयोग अवश्य करें।रासायनिक उर्वरकों की कीमतें बढ़ जाने के कारण जैव उर्वरकों का प्रयोग अति आवश्यक है।रासायनिक उर्वरकों की मात्रा का आधारीय एवं खड़ी फसल में टॉप ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग करने पर पौधे आधा या एक तिहाई भाग ही उपयोग कर पाते हैं।अधिकांश भाग पानी के साथ लीचिंग क्रिया द्वारा या वायुमंडल में डिनाइट्रिफिकेशन से या भूमि में अघुलनशील अवस्था में पड़ा रहता है।रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से सूक्ष्मजीवों की क्रियाशीलता मंद पड़ जाती है ।इनकी क्रियाशीलता बढ़ाने के लिए मिट्टी में जीवांश पदार्थों की उपस्थिति,नमी, वायु संचार एवं मिट्टी की दशा में सुधार होना अति आवश्यक है।प्राकृतिक रूप से मिट्टी में कुछ ऐसे जीवाणु पाए जाते हैं जो वायुमंडलीय नत्रजन को अमोनिया में एवं स्थिर फास्फोरस को उपलब्ध अवस्था में बदल देते हैं।जीवाणु खाद ऐसे ही जीवाणुओं का उत्पाद है जो पौधों को नत्रजन फास्फोरस आदि की उपलब्धता को बढ़ाता है ।इन जैव उर्वरकों में राइजोबियम एजोटोबेक्टर एजोस्पाईरिलम फास्फेटिका एवं नील हरित शैवाल मुख्य हैं।राइजोबियम एक नमी धारक पदार्थ एवं जीवाणु का मिश्रण है।इसके एक ग्राम भाग में 10 करोड़ से अधिक जीवाणु होते हैं।इस जैव उर्वरक का प्रयोग केवल दलहनी फसलों में किया जा सकता है।फसल के अनुसार अलग-अलग प्रकार के राइजोबियम कल्चर का प्रयोग किया जाता है।राइजोबियम कल्चर से बीज का उपचार करने पर यह जीवाणु बीज पर चिपक जाते हैं।बीज अंकुरण होने पर यह जीवाणु जड़ मूल रोम द्वारा पौधों की जड़ों में प्रवेश कर जड़ ग्रंथियों का निर्माण करते हैं।यह ग्रंथियां नत्रजन स्थिरीकरण के कार्य में सहायक होती हैं।ग्रंथियों की संख्या का पौधों की बढ़वार पर प्रभाव पड़ता है।अधिक गांठे होने पर पैदावार भी बढ़ जाती है ।अलग-अलग फसलों के लिए विशिष्ट राइजोबियम का प्रयोग किया जाता है।इसका प्रयोग उड़द मूंग चना मटर मसूर मूंगफली अरहर सोयाबीन बरसीम रिजका तथा सभी प्रकार की बींस में प्रयोग किया जाता है।200 ग्राम राइजोबियम कल्चर से 10 किलोग्राम बीज उपचारित कर सकते हैं।एक पैकेट जिसका वजन 200 ग्राम होता है इसका प्रयोग करने के लिए आधा लीटर पानी में 50 ग्राम गुड़ डालकर गर्म करते हैं।ठंडा करने के बाद इसमें राइजोबियम कल्चर के एक पैकेट को अच्छी तरह से मिला देते हैं। अब इस घोल को बीज के साथ अच्छी तरह मिलाकर छायादार स्थान में सुखाकर इसकी बुवाई की जाती है।इसके प्रयोग से 10 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की बचत होती है । फसल के उत्पादन में 15 से 20% की वृद्धि होती है एवं विटामिंस भी बनाते हैं जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है तथा जड़ों का विकास भी अच्छा होता है।इन फसलों की फसलों की बढ़वार अधिक होने पर अधिक पैदावार मिलती है।एजोटोबेक्टर का प्रयोग दलहनी फसलों को छोड़कर अन्य फसलों में किया जा सकता है।इसके प्रयोग से फास्फोरस अधिक उपलब्ध होता है।जैव उर्वरकों के प्रयोग से बीमारी फैलाने वाले रोग कारकों की संख्या में कमी आती है जिससे बीमारियों से फसल का बचाव होता है । पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है ।फास्फेटिका जैव उर्वरक का प्रयोग करने से मृदा में उपस्थित अघुलनशील फास्फोरस घुलनशील अवस्था में परिवर्तित हो जाता है । फास्फोरस का प्रयोग करने के लिए किसान भाई डीएपी का प्रयोग करते हैं ।डीएपी खाद महंगी होती है । अतः उसका भरपूर उपयोग करने के लिए फास्फेटिका जैव उर्वरक का प्रयोग अवश्य करें ।जैव उर्वरकों का प्रयोग किसी भी रसायन या रासायनिक उर्वरक के साथ मिलाकर न करें । बीज शोधन व उपचार करने के लिए यदि फफूंदनाशक कीटनाशक तथा जैव उर्वरक का प्रयोग एक साथ करना हो तो सबसे पहले फफूंदनाशक इसके बाद कीटनाशक और इसके बाद राइजोबियम कल्चर या जैव उर्वरक का प्रयोग करते हैं । बीज उपचार के लिए सरसों एवं सूरजमुखी में जैव उर्वरक की 200 ग्राम मात्रा, मक्का एवं कपास में आधा किलोग्राम, गेहूं एवं ज्वार की फसल में 1 किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ की दर से प्रयोग किया जाता है । बीज उपचार के लिए जैव उर्वरक की उपयुक्त मात्रा को डेढ़ लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ बीज की मात्रा के साथ मिला कर बुवाई करें । जड़ उपचार करने के लिए जैव उर्वरक की डेढ़ से 2 किलोग्राम मात्रा को प्रति एकड़ की दर से 6 से 8 लीटर पानी में घोल बनाएं तथा पौधे की जड़ों को 2 से 3 मिनट तक डुबा कर खेत में रोपाई करें । कंद उपचार करने के लिए जैव उर्वरक की 2 किलोग्राम मात्रा को प्रति एकड़ की दर से 15 लीटर पानी में घोल बनाएं और इस घोल में कन्दों को 5 से 10 मिनट तक डुबाएं और इसके बाद उपचारित कंदों की बुवाई करें । मिट्टी के उपचार हेतु जैव उर्वरक की डेढ़ किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ की दर से 50 किलोग्राम कंपोस्ट खाद या सड़ी गोबर की खाद में मिलाकर खेत की तैयारी करते समय खेत में मिला दें अथवा पहली सिंचाई के समय खेत में एक समान रूप से छिड़ककर मिट्टी में मिला दें । नील हरित शैवाल का प्रयोग धान की फसल में किया जाता है । इसका प्रयोग साढे़ 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के एक सप्ताह बाद प्रयोग करें । नील हरित शैवाल के प्रयोग करते समय खेत में 3 से 4 सेंटीमीटर पानी अवश्य भरा रहना चाहिए यदि धान में किसी खरपतवारनाशी का प्रयोग किया गया है तो नील हरित शैवाल का प्रयोग खरपतवारनाशी के प्रयोग के तीन से चार दिन बाद करें ।

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