Lakhimpur- Kheri-News: कविवर भोलानाथ शेखर की जयंती आज (13 अक्टूबर ) सादगी से मनाया जाएगा स्मृति दिवस

एन.के.मिश्रा

लखीमपुर खीरी।श्री भोलानाथ शेखर की गणना सनेही मण्डल के प्रमुख कवियों में की जाती है।माँ शारदे के इस वरद पुत्र का जन्म 13 अक्टूबर 1912 को खीरी टाउन के खत्री टोला मोहल्ले में हुआ था । पिता कालीचरन शेखर परम धार्मिक व्यक्ति थे। उनका परिवार बनियान वाले शेखरजी के नाम से समाज में ख्यात था ।

कविता लेखन और अभिनय का शौक उन्हें बचपन से ही था ।

उनकी युवा कवि मण्डली में ‘हरहर महादेव‘ महाकाव्य के प्रणेता राम प्रसाद सर्राफ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी व ‘बचालो देश‘ काव्य कृति के प्रणेता ब्रज बिहारी लाल सहगल, पं0 यमुनादीन मिश्र ‘यमुनेन्द्र‘ छन्दकार, सीताराम ‘भुर्जेश‘ प्रमुख थे ।

गोष्ठियों का दौर चलता था। समस्या पूर्ति का चलन था। समस्या पूर्ति से कवियों की प्रतिभा का आंकलन किया जाता था। उस दौर में गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेहीजी‘ की पत्रिका ‘सुकवि‘ में रचनाओं का प्रकाशित होना गौरव और प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी।

उनकी कई समस्या पूर्तियाँ ‘सुकवि‘ पत्रिका में प्रकाशित हुई है। शेखरजी का जैसा नाम था ‘भोलानाथ‘ वैसा ही उनका भोला स्वभाव भी था।वह निष्कपट व भावुक कवि थे। वह स्त्री जाति का बहुत सम्मान करते थे ।

‘तुमने सदैव चलना सीखा खांड़ों पर और दुधारों पर ।

                तुम वीर पदमिनी रानी हो जो कूदी थी अंगारों पर ।

‘ उन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन का वह दौर अपनी आँखों से  देखा था ।

        ‘जब अंग्रेजों की पुलिस पकड़  सत्याग्रहियों को लेती थी,

                               हथकड़ी हाथ में तथा पैर में बेड़ी डलवा देती थी,

      मारते-मारते जब उनकी चमड़ी उधेड़ दी जाती थी,

                            तब कारागृह ले जा उनको, तन्हाई दे दी जाती थी ।

 होली का मिलन और हुड़दंग का जीवंत चित्रण उनकी कविता में मिलता है ।

‘कुमकुम मार रहा कोई, लिए कोई अबीर का थाल मल रहा कोई रोली भाल,

                       मिल रहा कोई भुजा पसार,अजब है होली का त्यौहार,

         कहीं बोतलें खुल रही बंद,  पी रहे मित्र मित्र के संग,

निखालिस कोई पीता और पी रहा सोडा वाटर डार ,

                              अजब है होली का त्यौहार ।

‘वह ‘कामना‘ कविता में कहते हैं ‘‘चाहता हूं देश की स्वतन्त्रता बनी रहे, चाहता हूं देश की अखण्डता बनी रहे , चाहता हूं देश में सर्वत्र रामराज हो, चाहता हूं देश का सुखी-सुखी समाज हो ।

‘ 1962 के चीनी आक्रमण से उन का मन व्यथित था। वह चाऊ को चुनौती देते हुये कहते हैं-

‘तूने चाऊ क्या समझा है, भारत के लाल प्रवालों को । तूने चाऊ क्या समझा है काले-कराल विकरालों को । इतिहास खोल कर देख आज उस झांसी वाली रानी का । आजाद, चन्द्रशेखर, बिस्मिल तात्या की अमर कहानी का ।

‘आज से ठीक 55 वर्ष पूर्व वह घड़ी भी आई । दशहरा मेला के ऐतिहासिक काव्य मंच पर आशु कवि डा0 बृजेन्द्र अवस्थी मंच का संचालन कर रहे थे ।

काव्य प्रेमी श्रोताओं की भीड़ उस घटना की साक्षी बनी ण्ण्कविवर भोलानाथ शेखर को मंच परकाव्य पाठ के लिये आहूत किया गया ।

उन्होंने नारी महिमा पर अपनी प्रसिद्ध रचना प्रस्तुत की और संचालक से निवेदन किया कि उनके पौत्र को भी पढ़वा दें ।

 डा0 बृजेन्द्र अवस्थी ने उनके पौत्र को मंच पर बुलाया । उस बच्चे ने शेखर जी की कविता इतनी ओजस्वी वाणी में प्रस्तुत की कि पूरा मंच वाह वाह कर उठा । प्रसन्नता के इस अतिरेक में शेखर जी की वाणी रूंध गई । उनके मुख से निकला  ‘‘वाहबेटा ” और वह संचालक की गोद में लुढ़क गये ।

शेखर जी के मुख से निकले यह अन्तिम शब्द थे । कुछ देर बाद मर्माहत करने वाला समाचार आया कि शेखर जी नहीं रहे । कवि सम्मेलन समाप्त कर दिया गया । उस दिन (13 अक्टूबर 1965) करवाचैथ का पर्व था । उस करवाचैथ की रात डा0 बृजेन्द्रअवस्थी के शब्दोंमें ‘जब असंख्य सधवाओं सुहागिनों का चन्द्रमा आकाश परउदित हो रहा था हतभाग्य इस परिवार के भाग्याकाश का चन्द्रमा अकस्मात अस्त हो गया था ।

‘शेखर जी एक ऐसे दिव्य व्यक्तित्व के स्वामी थे । जिनकी जन्मतिथि व निर्वाण तिथि एक ही है

कोरोना काल और सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष उनका स्मृति दिवस बेहद ही शालीनता के साथ मनाया जा रहा है इस मौके पर उनके निवास स्थान विद्युत बाजार,  नई बस्ती पर उनके सभी परिवार जन उन्हें श्रद्धांजलि देंगे

 “ छन्द समस्या पूर्ति लिख कवि कुल किया सनाथ ।

                               कवियों के सिरमौर थे शेखर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *