Gonda News:महान सूफी संत महबूब मीनाशाह का निधन, शोक में डूबा शहर,देश के कोने-कोने से पहुच रहे है अनुयायी

राम नरायन जायसवाल

गोण्डा।मीनइया मदरसा व मीना इंस्टीट्यूट के संस्थापक  जिले की अजीम शख्सियत महान सूफी संत हजरत महबूब मीना शाह बाबाजी का आज इन्तिक़ाल हो गया। उनके निधन की खबर सुनकर पूरा शहर गमजदा हो गया। लोगों की आंखों से आंंसुओं का सैैैलाब उमड़ पड़ा, क्योंकि बाबाजी को सभी जाति-धर्म के लोग मानते थे।

मीना शाह  इंस्टीटयूट के संस्थापक हज़रत महबूब मीना शाह का शुक्रवार को दिन में एक बजे हुए निधन के पश्चात उनके शागिर्द व श्रंद्धांलुओ का अंतिम दर्शन के लिए तांता लगा रहा है। उक्त जानकारी देते हुए उनके शागिर्द डाक्टर लाइक ने बताया है बाबा जी को सुपुर्द ए खाक की रस्म शनिवार को जौहर के बाद मीनाइया परिसर में अदा की जायेगी। 

बसपा नेता पूर्व लोकसभा प्रत्याशी मसूद आलम खां ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि हम बहुत ही रंज व गम का इजहार करते हैं। बाबा जी को हम खिराजे अकीदत पेश करते हैं। बाबा जी की कमी कभी भी पूरी नहीं हो सकती।गोण्डा के भाजपा सांसद कीर्तिवर्धन सिंह उर्फ राजा भैया, पूर्व मंत्री व सपा नेता विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह, सूरज सिंह, पूर्व विधायक रामविशुन आजाद, कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष राघवराम मिश्र, कम्युनिस्ट नेता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेश त्रिपाठी, रविचंद्र त्रिपाठी, कांग्रेस के पूर्व नगर अध्यक्ष अब्दुल रहमान, पूर्व चेयरमैन कमरूद्दीन कमर, नगर पालिका अध्यक्ष उज्मा राशिद मौजूद रहे।
इसके अलावा प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के जिलाध्यक्ष सुरेश कुमार शुक्ला, मंडल अध्यक्ष मंटू काजी, पूर्व विधानसभा प्रत्याशी व सपा नेता सग़ीर उस्मानी, डॉक्टर लायक अली, डॉक्टर सादिर के साथ ही तमाम राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों, शिक्षाविदों, अधिकारियों, बुद्धिजीवियों ने हजरत महबूब मीनाशाह के निधन को अपूर्णीय क्षति बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की है।

स्वतंत्रता आन्दोलन में काटा जेल

सूफी संत हजरत महबूब मीनाशाह का जन्म 03 जुलाई 1934 को लखनऊ के यहियागंज में हुआ था। इनके बचपन का नाम अजीज हसन था। इनके पिता मौलवी जियाउद्दीन जाने माने तालुकेदार थे। अजीज हसन की प्राथमिक शिक्षा लख्ननऊ के हुसैनाबाद इण्टर कालेज, इण्टरमीडिएट कराची के एचआइएमएस बहादुर कालेज और उच्च शिक्षा मुस्लिम युनिवर्सिटी में हुई। नेवी की नौकरी के दौरान वर्ष 1944 से 1946 तक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लेने के लिए भारत की ओर से सिंगापुर भेजा गया।

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